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गुरुवार, 12 जुलाई 2018

जुलाई 12, 2018

भगवान राम के जीवन से जुड़े स्थलों का भृमण करवाएगी ‘श्री रामायण एक्सप्रेस', ये होगा रूट


रेल मंत्रालय ने हिन्दूओ की आस्था का ध्यान रखते हुए एक खास ट्रैन की शुरुआत की हैं जिसका नाम ‘श्री रामायण एक्सप्रेस’ रखा गया हैं।

नवंबर से होगी शुरुआत

14 नवंबर को दिल्ली से रवाना होने के बाद इस विशेष ट्रेन का पहला पड़ाव अयोध्या होगा। हनुमान गढ़ी, रामकोट और कनक भवन मंदिर के दर्शन के बाद यह विशेष पर्यटक ट्रेन नंदीग्राम, सीतामढ़ी, जनकपुर, वाराणसी, प्रयाग, श्रृंगवेरपुर, चित्रकूट, नासिक, हंपी और रामेश्वरम जाएगी। यहां से जो यात्री श्रीलंका में स्थित भगवान राम से जुड़े स्थलों का दर्शन करने के लिए जाना चाहेंगे उन्हें हवाई जहाज से वहां ले जाया जाएगा।

श्रीलंका तक जाने का मिलेगा ऑप्शन

विशेष ट्रेन में 800 यात्री सफर कर सकेंगे। सिर्फ भारत में यात्र करने वाले यात्रियों को 15,120 रुपये प्रति व्यक्ति की दर से किराया चुकाना होगा। वहीं, श्रीलंका जाने वालों को चेन्नई से हवाई मार्ग के जरिये कोलंबो ले जाया जाएगा। पांच दिन और छह रात वाले श्रीलंका के टूर पैकेज के लिए प्रति व्यक्ति को 36,970 रुपये अतिरिक्त देने होंगे। श्रीलंका में कैंडी, नुवारा एलिया, कोलंबो, नेगोंबो में रामायण काल से जुड़े स्थलों के दर्शन का मौका मिलेगा। भारत से श्रीलंका तक का सफर 16 दिनों का होगा।
जुलाई 12, 2018

जान लीजिए इस साल जगन्नाथ यात्रा का सही समय एवं मुर्हत


पूरी जगन्नाथ यात्रा का हिन्दू धर्म मे बहुत महत्व हैं, जगन्नाथ का अर्थ ‘जगत के नाथ’ यानी भगवान विष्णु है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है कि हर व्यक्ति को अपने जीवन में एकबार जगन्नाथ मंदिर के जरुर जाना चाहिए,उड़ीसा राज्य के पुरी में स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर भारत के चार पवित्र धामों में से एक है। हर साल होने वाली ये यात्रा काफी पवित्र मानी जाती है। हर साल देश विदेश से लाखों लोग जगन्नाथ यात्रा में हिस्सा लेने आते हैं।

हिन्दू पंचांग के अनुसार, पुरी यात्रा हर साल आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को निकाली जाती है। इस यात्रा के माध्यम से भगवान जगन्नाथ साल में एक बार प्रसिद्ध गुंडिचा माता के मंदिर जाते हैं।

हर साल निकलने वाली जगन्नाथ रथ यात्रा इस साल 14 जुलाई शनिवार को 04:34:14 से द्वितीया आरम्भ जुलाई 15, 2018 को 00:56:51 पर द्वितीया समाप्त होगी।

बुधवार, 11 जुलाई 2018

जुलाई 11, 2018

कभी पानी मे डूबा रहने वाला ये मंदिर आज हैं पानी का मोहताज़।


श्मशानेश्वर महादेव के नाम से जाना जाने वाला ये मंदिर राजस्थान की राजधानी जयपुर में स्तिथ हैं। बाईस साल पहले तक रामगढ़ बांध के बीच हमेशा जल में डूबेे रहने वाले भगवान भोलेनाथ के इस मंदिर को इस मानसून में भी पवित्र बाण गंगा नदी के बहने का बेसब्री से इंतजार है। वर्ष 1981 में आई बाढ़ में बांध के गेट खोलने के बाद भी छह से आठ फीट की चादर चली थी तब से 1999 तक श्मशानेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध यह मंदिर पानी में ही डूबा रहा था। लेकिन अब यहां हर तरफ सूखा ही नजर आता है। यह बांध वर्ष 1904 में बनकर तैयार हुआ तब इसमें पानी के भरने पर श्मशानेश्वर महादेव का मंदिर भी जल में डूब गया था। बांध में पानी आने की उम्मीद में बीते दिनों रामगढ़ लाइव से जुड़े कार्यकर्ताओं ने यज्ञ का आयोजन करवा मंदिर में नियमित पूजा पाठ की भी व्यवस्था कर दी।

मंदिर का इतिहास

  • ढूढाड़ में कछवाहों का आगमन होने के पहले से बाण गंगा नदी पर बने इस मंदिर के पास में मीणा व अन्य जातियों का श्मशान था। 
  • आमेर महाराजा पृथ्वीराज 1503 में नाथ संतों की तपस्या स्थली रहे श्मशानेश्वर महादेव मंदिर में कई औघड़ साधुओं ने कठोर तपस्या भी की थी। मंदिर में एक गुफा भी थी। 
  • वर्ष 1904 में बने बांध में पानी के साथ आई मिट्टी से गुफा भी बंद हो गई। पुराने लोगों का कहना है कि इस इलाके के लोग बाण गंगा को पवित्र गंगा नदी मानकर अस्थियों का विसर्जन भी करते थे।


मंगलवार, 10 जुलाई 2018

जुलाई 10, 2018

इस मंदिर के महंत हैं योगी आदित्यनाथ, हिन्दुओ के साथ मुस्लिम भी करते हैं मंदिर में सेवा...


हिंदुओं की आस्था का केंद्र नाथ संप्रदाय का विश्वप्रसिद्ध मंदिर गोरखनाथ की खास विशेषता है कि इससे हिंदू से ज्‍यादा मुसलमान जुड़े हुए हैं। चाहे वो मंदिर परिसर में लगी दुकाने हों या मंदिर का निर्माण। सभी में मुस्लिम समुदाय के लोगों की खास भूमिका रही है।

गोरखनाथ मंदिर परिसर में वर्तमान में जो भी निर्माण कार्य होते हैं, उसकी देखरेख मोहम्मद यासीन अंसारी करते हैं, जोकि मुस्लिम समुदाय के हैं। साल 1977 से वो यहां रहकर अपना और परिवार का जीवनयापन बखूबी कर रहे हैं। इनके बेटे मोहम्मद सलीम अंसारी गुरु गोरखनाथ चिकित्सालय के फिजियोथेरेपी विभाग में बतौर फिजियोथेरेपिस्ट काम कर रहे हैं। यासीन के पिता गोरखनाथ मंदिर के 'कोठारी' रह चुके हैं। वह चावल-दाल और आटा तक का हिसाब-किताब रखते थे। इनका जनाजा भी इसी मंदिर से धूमधाम से निकला था।

इनायतुल्ला अली और नसीर अहमद यहां माली के रूप में काम करते थे। बुजुर्ग होने के कारण अब इनके लड़के मंदिर परिसर में रहकर सेवा के माध्यम से अपना और अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं। गोरक्षा के इस केंद्र के अंदर बनी गौशाला की जिम्मेदारी इनायतुल्लाह के बेटे मान मोहम्मद अंसारी के हाथ में है। गोबर-पानी, दाना-पानी से लेकर दूध निकालने तक का काम मोहम्मद अंसारी ही करते हैं। यह लगातार सात साल से मंदिर की सेवा कर आदित्यनाथ की सरपरस्ती में अपना परिवार चला रहे हैं।

आपको जानकर और भी ताज्जुब होगा कि मंदिर के मुख्य आर्किटेक्ट इंजीनियर तिवारीपुर इलाके के निसार अहमद रहे हैं। इनकी देखरेख में कई मंदिर और धर्मशालाएं बनी हैं।

ये खबर उन तमाम सेकुलरो और धार्मिक नेताओं के मुँह पर एक तमाचा हैं जो की कहते हैं की योगी आदित्यनाथ सांप्रदायिक हैं, क्या अपने आपको हिन्दू बोलना,हिन्दुओ की आवाज उठाना,हिन्दुओ के दुश्मनों की जड़े काटना साम्प्रदायिकता हैं?

रविवार, 8 जुलाई 2018

जुलाई 08, 2018

फ़िल्म लवरात्रि विवाद, उपदेश राणा ने सलमान से पूछा, ईद पर हलाला रिलीज हो तो कैसा फील करोगे?

सलमान खान अपने बहनोई आयुष को लवरात्रि फ़िल्म के माध्यम से लांच कर रहे हैं।हालांकि इस फ़िल्म को रिलीज ऐसे समय के आस पास किया जा रहा हैं जब कि भारत का बहुसंख्यक हिन्दू समुदाय नवरात्रि पर्व मनाता हैं।फ़िल्म 5 अक्टूबर को रिलीज
राणा ने अपने फेसबुक पेज पर शेयर किया ट्वीट के स्क्रीन शॉट

ऐसे में इस फ़िल्म के नाम को लेकर लोगो मे कई तरह की आशंका बनी हुई हैं।चूँकि बॉलीवुड में हिन्दू समुदाय का अपमान, भारत के साथ साथ पाकिस्तान जैसे देशों में भी फ़िल्म हिट करवाने का आसान फार्मूला बन चुका हैं, इसी वजह से लोगो मे ये आशंका रहती हैं कि अपनी फिल्म हिट करवाने के चक्कर मे फिर से कोई डायरेक्टर जानबूझकर हिन्दुओ का अपमान ना कर दे।

उपदेश राणा ने ट्वीट करके किया सवाल
उपदेश राणा ने सलमान खान को ट्वीट करके सवाल किया कि अगर ईद पर हलाला के नाम से मूवी रिलीज हो तो आपको कैसा लगेगा?
राणा ने ट्वीट किया कि ‘Dear @BeingSalmanKhan तुम्हारे प्रोडक्शन में नवरात्रि पर, लवरात्रि नामक मूवी रिलीज हो रही है ,कृपया तुरंत इसका नाम चेंज करें, ईद पर हलाला रिलीज हो जाए, तो कैसा फील करोगे ? सभी की भावनाओं का सम्मान करो, It is real Being human..’

अब देखना हैं कि हिन्दुओ की इस अपील का सलमान खान पर कितना असर होता हैं?

जुलाई 08, 2018

योगीराज में कावड़ियों के लिए होगी ये खास व्यवस्था, पढ़कर झूम उठेंगे भोले भक्त।


कावड़ यात्रा की तैयारियों में पूरा UP प्रशासन जुट गया हैं, हर एक चीज की बारीकी से जांच की जा रही हैं, योगी राज में भोले के भक्तों को कोई खास परेशानी ना हो इसको लेकर खास तैयारियां की जा रही हैं।

सालों बाद कावड़ियों को मिली थी DJ बजाने की छूट
वैसे तो कावड़ यात्रा बिना DJ, भजनों के अधूरी हैं, लेकिन दुर्भाग्यवश UP में पिछली सरकार में कावड़ियों को DJ बजाने की अनुमति नहीं थी, लेकिन राज बदलते ही योगी राज में कावड़ियों को सालों बाद DJ बजाने की अनुमति दी गयी।

समुदाय विशेष के हमलों का रहता हैं खतरा
ज्ञात हो कि पिछले सालों में कई बार कावड़ यात्रा पर किसी न किसी बहाने से दूसरे समुदाय के लोग हमला कर चुके हैं, इसीलिए इसबार प्रशासन काफी सतर्क हैं, भोले के भक्तों की सुरक्षा के लिए अतिरिक्त फ़ोर्स मंगाया जा रहा हैं।

उत्तराखंड की सीमा से दिल्ली बॉर्डर तक हेलिकॉप्टर से होगी पुष्पवर्षा
इस बार पहली दफा एक सप्ताह तक उड़नखटोला मेरठ जोन के जिलों में आसमान पर रहेगा। यह हेलीकॉप्टर पुरा महादेव में भगवान शिव और उनके भक्त कांवड़ियों पर पुष्प वर्षा करेगा। वहीं, उत्तराखंड की सीमा से लेकर दिल्ली बार्डर तक कांवड़ियों पर पुष्प वर्षा भी की जाएगी।

शनिवार, 7 जुलाई 2018

जुलाई 07, 2018

इंडोनेशिया के मुसलमान भी रखते हैं हिन्दू नाम, कारण जानकर चौंक जाएंगे आप।


दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाले देश  इंडोनेशिया में मुस्लिम आज भी अपनी हिन्दू संस्कृति से जुड़े हुए हैं।
इंडोनेशिया में हिंदू आबादी दो फीसदी से भी कम है, लेकिन फिर भी यहां की हर चीज पर हिंदू संस्कृति की छाप देखने को मिलती है.

कभी हिन्दू साम्राज्य का हिस्सा था
जावा इंडोनेशिया का एक प्रमुख द्वीप है, जहां लगभग 60 प्रतिशत आबादी बसती है. 13वीं से 15वीं शताब्दी के बीच यहां माजापाहित नाम का हिंदू साम्राज्य खूब फला फूला जिससे यहां की संस्कृति, भाषा और भूमि पर हिंदू संस्कृति की अमिट छाप पड़ गई. पूरे शहर में दुकानों, स्कूलों और जगहों पर संस्कृत के शब्द दिख जाते हैं.कई लोगों को हैरानी होती है कि इंडोनेशिया में जगहों और लोगों के नाम संस्कृत शब्दों में रखे गए हैं. यहां कई मुस्लिमों का नाम विद्या, प्रिया, कृष्णा, विसनु मिल जाता है. भाषा पर भी संस्कृत का प्रभाव दिखता है.दरअसल, संस्कृत जावानीज भाषा का हिस्सा बन चुकी है.
आज भी दिखता हैं हिन्दू इतिहास का प्रभाव
इंडोनेशियाई और जावानीज भाषा में संस्कृत के बोध वाले कई शब्द मिल जाएंगे. इंडोनेशिया के इतिहास में कई बड़े और प्रभावशाली हिंदू साम्राज्य हुए जिनका प्रभाव आज तक बना हुआ है. सातवीं सदी में व्यापार के कारण इंडोनेशिया में शक्तिशाली श्रीविजया साम्राज्य पनपा. 13वीं सदी के अंत में पूर्वी जावा में हिंदू मजापहित साम्राज्य की स्थापना हुई थी. इस्लाम यहां बाद में आया.जावा में कई हिंदू और बौद्ध मंदिर हैं. 

बुधवार, 4 जुलाई 2018

जुलाई 04, 2018

अगर घर मे रखते हैं गंगाजल तो ये खास बातें जरूर ध्यान रखे।


गंगाजल से जुड़ी ये बातें हमेशा ध्यान रखें | 

  •  गंगाजल को हमेशा तांबे या चांदी के बर्तन में रखना चाहिए। अधिकतर लोग प्लास्टिक की बोतल में गंगाजल रखते हैं, जो कि अशुभ होता है।
  •  घर के जहां गंगाजल रखा जाता है, वहां साफ सफाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए। गंगाजल पूजनीय होता है और इसके आसपास पवित्रता बनाए रखें।
  •  जिस कमरे में गंगाजल रखा जाता है, वहां मांस-मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए।
  • समय-समय घर में गंगाजल की कुछ बूंदों का छिड़काव करते रहना चाहिए। इससे घर में सकारात्मकता बनी रहती है। गंगाजल का उपयोग करने से पहले हाथों को साफ कर लेना चाहिए। इसके बाद मां गंगा का ध्यान करते हुए इसका प्रयोग करें।
  •  ध्यान रहे कि गंगाजल को कभी भी अंधेरे स्थान पर कभी नहीं रखना चाहिए।
  •  हर शनिवार एक लोटे में साफ जल भरें और उसमें थोड़ा सा गंगाजल डाल लें। ये पानी पीपल को चढ़ाएं। ऐसा करने से शनि के साथ कुंडली के अन्य दोषों से भी मुक्ति मिल सकती है।
  •  गंगा जल हो या फिर किसी दूसरी पवित्र नदी का जल हो, उसे हमेशा ईशान कोण में ही रखें।
  •  गंगा जल को कभी भी गंदे और जूठे हाथों से नहीं छूना चाहिए।

शनिवार, 29 अक्टूबर 2016

अक्टूबर 29, 2016

ईरान ने भारतीय युवती पर हिजाब पहनने के लिए डाला दबाब, उसके बाद जो हुआ जानकार चौंक जायेंगे आप

ईरान में आयोजित होने वाली एशियाई एयर गन शूटिंग चैंपियनशिप में पूर्व वर्ल्ड नंबर वन पिस्टल शूटर अर्जुन अवॉर्डी हीना सिद्धू ने खेलने से इनकार कर दिया है।दरअसल ईरान की ओर से विदेशी महिला खिलाड़ियों के लिए हिजाब (स्कार्फ) पहनकर खेलने की अनिवार्यता हैं ,इसको चुनौती देते हुए भारतीय महिला शूटर ने चैंपियनशिप में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया है।




धर्म के मामले में जबरदस्ती बर्दाश्त नही..
हीना ने नेशनल राइफल एसोसिएशन ऑफ इंडिया को साफ किया है कि उन्हें इस कंपटीशन में हिजाब पहनकर खेलना मंजूर नहीं है।मीडिया से बातचीत में उन्होंने बताया की लोग अपने धर्म का पालन करे और उनको अपने धर्म का पालन करने दिया जाए.अगर मुझ पर किसी दुसरे धर्म के विचार थोपे जायेंगे तो मुझे ऐसा कबूल नहीं. उनका मानना हैं की खेलों के लिए हिजाब पहनने की अनिवार्यता ठीक नहीं है।

बाकी महिला सदस्य पहनेंगी हिजाब..

एनआरएआई ने इस चैंपियनशिप के लिए 18 सीनियर व जूनियर महिला शूटरों का चयन किया है। इस चैंपियनशिप सुमा शिरूर, हरवीन सराओ और मलायका गोयल जैसी शूटर खेलने जा रही हैं।खास बात यह है कि भारतीय टीम की बाकी सभी महिला शूटर तेहरान में ईरानी नियम के मुताबिक हिजाब पहनकर शूटिंग करेंगी।

एनआरएआई अध्यक्ष रणइंदर सिंह ने कहा कि सिर्फ हीना सिद्धू को एतराज था। उनकी जगह दूसरे शूटर का चयन कर लिया गया है लेकिन बाकी सभी शूटर तेहरान में सिर, कान और मुंह ढंककर ही खेलेंगे।


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सोमवार, 17 अक्टूबर 2016

अक्टूबर 17, 2016

जानिए मुस्लिम देश के सुल्तान के 'जय श्री राम' कहने की क्या है सच्चाई


वायरल सच: मुस्लिम देश के सुल्तान के 'जय श्री राम' कहने की क्या है सच्चाई
 सोशल मीडिया पर जय श्री राम के उद्घोष वाला वीडियो वायरल हो रहा है.वीडियो के वायरल होने की वजह सुल्तान के वो तीन शब्द हैं जिन्हें सुनकर सभी उनकी सराहना कर रहे हैं. मुस्लिम देश के सुल्तान के मुंह से जय श्री राम सुनने वाले हैरान हैं. दावा है कि दुबई के सुल्तान ने मोरारी बापू की कथा शुरु होने के वक्त जय श्री राम का उद्घोष किया.

जानिये क्या हैं इस विडियो के पीछे का सच
एक हिंदी न्यूज़ चेनल की रिपोर्ट के अनुसार मोरारी बापू की कथा का कार्यक्रम पिछले महीने 17 सितंबर से 25 सितंबर तक हुआ था. कार्यक्रम अबू धाबी के 5 स्टार होटल एमीरेट्स पैलेस में हुआ था. यानि कार्यक्रम दुबई में नहीं अबू धाबी में हुआ था.


सच जानने के लिए न्यूज चेनल ने रामकथा वाचक मोरारी बापू से बात की. मोरारी बापू ने बताया कि अबू धाबी के शाही परिवार ने कथा में स्वंयसेवकों की तरह काम किया.

पड़ताल में ये साफ हो गया कि जय श्री राम कहने वाले दुबई के सुल्तान नहीं बल्कि अबू धाबी के शाही परिवार के ही सदस्य थे. यानि दुबई के नहीं बल्कि आबू धाबी के शाही परिवार के शेख ने जयश्री राम कहा.
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सोमवार, 19 सितंबर 2016

सितंबर 19, 2016

गणेश विसर्जन के दौरान अचानक आ गयी एम्बुलेंस, फिर जो हुआ वो बेहद चौकाने वाला हैं


पूरे देश में दस दिनों तक चलने वाला गणेशोत्सव खत्म हो चुका है। पुरे देश के साथ-साथ सांस्कृतिक राजधानी पुणे में भी पूरे उत्साह के साथ झमाझम बारिश के प्रमुख तीन गणेश मंडलों की मूर्ति का विसर्जन किया गया। गणेश मूर्ति के विसर्जन के दौरान जब जुलूस निकाला जा रहा था तो सभी में बड़ा उत्साह था ख़ूब जोश में थे और सभी हिंदू लोग गणेश भक्ति में मतवाले हो रहे थे। बेहद दर्शनीय नज़ारा था फिर जुलूस में सारे जोश को छोड़कर एक नेक काम करने की बारी आयी।

यह घटना पुणे की है जब पुरे जोश के साथ जुलूस निकाला जा रहा था। भक्तिभाव और जोश के साथ-साथ होश क़ायम रखने की ऐसी मिसाल देखने को मिली जो आपको हिंदू धर्म के अलावा किसी और में देखने का सौभाग्य शायद कभी प्राप्त नहीं होगा।

पेश की मानवता कि मिशाल –

दरअसल, हम बताते हैं कि गणेश विसर्जन के जुलूस में क्या घटित हुआ। हुआ यूँ कि जुलूस के बीच में मरीज़ को कहीं ले के जा रही एक ऐम्ब्युलन्स आकर रुक गयी। और हिन्दुओं ने बड़े ही शांत भाव से और पूरी मानवता दिखाते हुए हॉस्पिटल की गाड़ी को तुरंत रास्ता दिया। इसका एक विडियों भी आया है जो इंटर्नेट पर काफ़ी वाइरल हो रहा है।
आप भी देखिए ये वीडियों –


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रविवार, 21 अगस्त 2016

अगस्त 21, 2016

भारत में नहीं बल्कि इस देश में स्तिथ हैं विश्व का सबसे बड़ा मंदिर



विश्व में सबसे अधिक हिन्दू भारत में रहते हैं, लेकिन आपको ये जानकार हैरानी होगी की विश्व का सबसे बड़ा मंदिर भारत में नहीं बल्कि उस देश में हैं जहाँ आज हिन्दू नाम मात्र के बचे हैं..

विश्व का सबसे बड़ा हिन्दू मंदिर combodia में हैं,ये मंदिर कम्बोडिया के अंकोर के सिमरीप शहर में मीकांग नदी के किनारे स्तिथ है और इसका नाम अंकोरवाट मंदिर है.

इस मंदिर की लोकप्रियता इतनी है कि इसे विदेशों से देखने लाखों लोग आते हैं यह एतिहासिक धरोहर इस देश के लिए कितनी मायने है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसे कम्बोडिया के राष्ट्र ध्वज पर अंकित किया गया है विदेशों में कम्बोडिया की पहचान अंकोरवाट मंदिर ही है

हालंकि अब ये मंदिर बोद्ध मंदिर में बदला जा चूका हैं लेकिन यह मंदिर पहले भगवान विष्णु को समर्पित था, यह मंदिर मेरु पर्वत का भी प्रतिक है, असुरों और देवताओं के बीच अमृत मन्थन का दृश्य भी दिखाया गया है मंदिर यूनेस्को के विश्व धरोहर स्थलों में से एक है यहाँ का सूर्योदय और सूर्यास्त देखने पूरी दुनिया से लोग आते हैं

अंकोरवाट मंदिर किसने बनवाया था ?

अंकोरवाट मंदिर का निर्माण राजा सूर्यवर्मन द्वितीय ने 1112 से 1153 के बीच करवाया था इसकी रक्षा के लिए इसके चारो तरफ एक विशाल खाई बनवाई गई थी जिसकी चौड़ाई लगभग 700 फीट है दूर से देखने पर ये खाई किसी झील के सामान दिखती है खाई पार करने के लिए मंदिर के पश्चिम में एक पुल बनाया गया था, मंदिर का कार्य सूर्यवर्मन द्वितीय ने प्रारम्भ किया था परन्तु इसका समापन धरणीन्द्रवर्मन के शासनकाल में हुआ था
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शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

अगस्त 12, 2016

क्या आप जानते हैं मंदिर में प्रवेश से पहले क्यूँ बजाया जाता हैं घंटा? आइये जानते हैं इसके वैज्ञानिक पहलु !



मंदिर में घंटी लगाए जाने के पीछे न सिर्फ धार्मिक कारण है बल्कि वैज्ञानिक कारण भी इनकी आवाज को आधार देते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि जब घंटी बजाई जाती है तो वातावरण में कंपन पैदा होता है, जो वायुमंडल के कारण काफी दूर तक जाता है। इस कंपन का फायदा यह है कि इसके क्षेत्र में आने वाले सभी जीवाणु, विषाणु और सूक्ष्म जीव आदि नष्ट हो जाते हैं जिससे आसपास का वातावरण शुद्ध हो जाता है।

अत: जिन स्थानों पर घंटी बजने की आवाज नियमित आती है वहां का वातावरण हमेशा शुद्ध और पवित्र बना रहता है।

साथ ही ऐसा भी माना जाता हैं की घंटा बजने से जो वाइब्रेशन होती है उसका असर हमारे शरीर पर पड़ता है इससे ध्यान लगाने में मदद मिलती है और पूजा करते वक़्त ध्यान भटकता नहीं है घंटा बजाने से पॉजिटिव एनर्जी भी मिलती है यही कारण है कि मंदिरों में आरती के वक़्त निरंतर घंटा बजाया जाता है ताकि सबका मन केवल भगवान की ओर ही रहे

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मंगलवार, 9 अगस्त 2016

अगस्त 09, 2016

यहाँ आत्मा करती हैं भारत-चीन बॉर्डर की निगरानी, चीनी सैनिको में भी हैं इसका काफी खौफ,देखे विडियो


आप माने या न माने लेकिन हमारे देश में शहीद होने के बाद भी तीन दशकों से एक जवान सरहद की रक्षा कर रहा है। यही कारण है कि अब लोग इन्हें कैप्टन बाबा हरभजन सिंह के नाम से पुकारते हैं। कुछ समय पहले तक इन्हें हर साल दो महीने की छुट्टी दी जाती थी। गांव जाने के लिए बाबा का बकायदा एसी फर्स्ट क्लास में रिजर्वेशन करवाया जाता था। खाली बर्थ पर बाबा का सामान रख दो सैनिक उन्हें गांव तक छोड़ने जाते थे। उस दौरान चीन सीमा पर चौकसी बढ़ा दी जाती थी। यह मानकर की इस समय बाबा यहां मौजूद नहीं हैं।

मौत के बाद सपने में आकर बतायी थी शव की लोकेशन

कैप्टन हरभजन सिंह ने वर्ष 1966 में 23वीं पंजाब बटालियन ज्वाइन की थी। 4 अक्टूबर 1968 में सिक्किम के टेकुला सरहद से घोड़े पर सवार होकर अपने मुख्यालय डेंगचुकला जा रहे थे तो वो तेज बहते हुए झरने में गिर गए थे। सेना ने उन्हें पांच दिन बाद लापता घोषित कर दिया गया था। उसी दिन रात में अपने साथी सैनिक प्रीतम सिंह को सपने में आकर अपने जीवित न रहने की जानकारी दी और बताया की उनका शव कहां पड़ा है। दूसरे दिन उसी स्थान पर सैनिकों ने उनका शव बरामद किया। दूसरे दिन राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार कर दिया गया। इसके बाद सैनिकों के साथ कुछ ऐसी घटनाएं हुईं जिससे उनके प्रति आस्था बढ़ गई और उन्होंने उनके बंकर को एक मंदिर का रूप दे दिया।

आज भी करते हैं सरहद की रक्षा!

जब उनके चमत्कार बढ़ने लगे और लोगो में उनकी आस्था गहरी होने लगी तो उनके लिए एक नए मंदिर का निर्माण किया गया जो की 'बाबा हरभजन सिंह मंदिर' के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर गंगटोक में जेलेप्ला दर्रे और नाथुला दर्रे के बीच, 13000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। पुराना बंकर वाला मंदिर इससे 1000 फीट ज्यादा ऊंचाई पर स्थित है।मंदिर के अंदर बाबा हरभजन सिंह की एक फोटो और उनका सामान रखा है। यही नहीं भारत और चीन के बीच होने वाली हर फ्लैग मीटिंग में हरभजन सिंह के नाम की एक खाली कुर्सी लगाईं जाती है ताकि वो मीटिंग अटैंड कर सके।

रोज लगते हैं बाबा के बिस्तर, सफाई के बाद भी जूतों में मिलता है कीचड़

लिहाज़ा सेना ने बाबा को छुट्टी पर भेजना बंद कर दिया। अब बाबा साल के बारह महीने ड्यूटी पर रहते है। मंदिर में बाबा का एक कमरा भी है जिसमे प्रतिदिन सफाई करके बिस्तर लगाए जाते है। बाबा की सेना की वर्दी और जूते रखे जाते है। कहते है की रोज़ पुनः सफाई करने पर उनके जूतों में कीचड़ और चद्दर पर सलवटे पाई जाती है।


आस्था का केन्द्र है यह मन्दिर

बाबा हरभजन सिंह का मंदिर स्थानीय लोगों और सेना के जवानों की आस्था का केन्द्र है। इस इलाके में आने वाला प्रत्येक सैनिक बाबा का प्रणाम कर उनका आशीर्वाद लेता है। स्थानीय लोग मानते हैं कि अगर एक बोतल में पानी भरकर यहां रख दिया जाए तो इसमें औषधीय गुण आ जाते हैं।


देखे विडियो :-
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रविवार, 7 अगस्त 2016

अगस्त 07, 2016

इस मंदिर को तोड़ने हेतु औरंगजेब ने भेजी थी बहुत शक्तिशाली सेना, लेकिन हुआ ऐसा चमत्कार की मुग़ल सैनिक यहाँ से उलटे पाँव अपनी जान बचाकर भागे


कहां हैं ये मंदिर?
जीण माता मंदिर जयपुर से से लगभग 115 किलोमीटर दूर सीकर ज़िले में अरावली पहाड़ियों में हैं. सीकर से लगभग 15 किमी जयपुर बीकानेर राजमार्ग पर गोरियां रेलवे स्टेशन के पास काजल शिखर पहाड़ी है. जीण का मंदिर यही है.

ये लिखा हैं इतिहास में 


"8 मार्च सन 1679 को बादशाह औरंगजेब की आज्ञा से एक विशाल मुग़लवाहिनी जिसमें तोपखाना तथा हस्ती सेना भी शामिल थी- सेनापति दराबखां के नेतृत्व में खंडेला के राजपूतों को सजा देने और उनके पूजा-स्थलों को तोड़-फोड़कर धराशाही कर देने हेतु भेजी गई| नबाब कारतलबखां मेवाती और सिद्दी बिरहामखां जैसे अनुभवी सेनानी, जो खंडेले के पहले युद्ध में पराजित होकर भाग गये थे- इस अभियान में शामिल थे|" (खंडेला का वृहद इतिहास; पृष्ठ- 98,99)


औरंगजेब ने टेके घुटने, हर महीने सवा मण तेल किया भेंट:

लोक मान्यता के अनुसार एक बार मुगलों के बादशाह औरंगजेब ने जीण माता और भैरो के मंदिर को तोडऩे के लिए अपने सैनिकों को भेजा था. शाही सेना मंदिर को तोड़ने के उद्देश्य से जीणमाता मंदिर की पहाड़ियों में जैसी ही पहुंची| पहाड़ियों में मौजूद बड़ी संख्या में "बड़ी मधुमक्खियाँ" जिन्हें स्थानीय लोग "भंवरा मोह" कहते है, छिड़ गई और औरंगजेब की सेना का काट-काट कर बुरा हाल कर दिया, तब उनसे बचने को औरंग के सेनापति मंदिर के पुजारियों की शरण में गये और बचाव का उपाय पूछा| पुजारियों द्वारा बताये जाने के बाद सेनापतियों ने देवी मंदिर में तेल चढ़ाया, तब जाकर मधुमक्खियों ने सेना का पीछा छोड़ा (आज भी किसी के घर में लगे पेड़ पर ये बड़ी मधुमक्खियाँ छाता बना लेती है तो उन्हें वहां से हटाने के लिए लोग जीणमाता के तेल की कड़ाही का भोग लगाने को बोलते है, ऐसा करते ही कुछ घंटों में ही मधुमक्खियाँ वहां से उड़ जाती है, यह प्रयोग स्थानीय लोगो के लिए बहुत कारगर हैं )| और तब से देवी माँ के मंदिर में दिया जलाने हेतु तेल का खर्च औरंगजेब के खजाने से आने लगा, जिसे बाद में दिल्ली द्वारा जयपुर रियासत के जिम्मे लगाया गया, जो आजादी से पूर्व तक मंदिर में आता था|
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अगस्त 07, 2016

ये हैं भारत का सबसे पुराना हिन्दू मंदिर, हजारो सालों से आज तक यहाँ चल रही हैं पूजा अर्चना


आज हम आपको एक ऐसे मंदिर के बारे में बता रहे हैं, जो भारत का सबसे पुराना मंदिर है जहां आज भी पूजा होती है। इस बात के प्रमाण भी हैं कि श्रीलंका के भी श्रद्धालु यहां आते थे। इसे 635-636 ईस्वी में बनाया गया था। हालांकि, कुछ अन्य अध्ययनों के मुताबिक़ लोग इसको और पुराना मानते हैं। गर्भगृह में शिव और शक्ति यानी देवी की मूर्तियां हैं। आज मंदिर टूटा हुआ है। कई मूर्तियां भी खंडित हैं। ये कैमूर की पहाड़ी (कैमूर जिला)पर 650 फीट ऊंचाई पर है। मंदिर का पुराना शिखर (टॉप) नष्ट हो चुका हैं, उसकी जगह नई छत बना दी गई है। इसका जिक्र अंग्रेज इतिहासकार कनिंघम ने भी किया है।

इसलिए कहा जाता हैं मुंडेश्वरी मंदिर 


इसे बिहार धार्मिक न्यास बोर्ड द्वारा फिर से व्यवस्थित किया गया है। लोगों की मान्यता है कि चंड-मुंड नाम के असुरों का नाश करने के लिए, जब देवी प्रकट हुई तो चंड के मारे जाने के बाद युद्ध करते-करते मुंड इसी पहाड़ी में आकर छिप गया था। यहीं पर देवी ने उसका वध किया था। इसी वजह से इसे मुंडेश्वरी माता का मंदिर कहा जाता है। पहाड़ी पर जगह-जगह बिखरे पत्थरों में सिद्धयंत्र और श्लोक खुदे हुए हैं। गर्भगृह का ढांचा अष्टाकार है। एक कोने में देवी मुंडेश्वरी जबकि बीच में चतुर्मुखी शिवलिंग है। अनुमान लगाया जाता है कि जब ये अपनी पूर्वअवस्था में रहा होगा, तब देवी के चारों ओर अलग-अलग देवताओं की मूर्तियां स्थापित रही होंगी। यहां की कई खंडित मूर्तियां पटना के संग्रहालय में भी रखी गई हैं।

श्रीलंका से भी आते थे श्रद्धालु

यहां दर्शन के लिए श्रीलंका से भी श्रद्धालु आते थे। इस बात का प्रमाण मंदिर के रास्तों में पाए गए सिक्के हैं। सिक्कों और यहां पहाड़ी के पत्थरों पर तमिल और सिंहली भाषा में अक्षर लिखे हुए हैं। पहाड़ी पर एक गुफा भी है। हालांकि, इसे सुरक्षा की वजह से बंद कर दिया गया है।
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शनिवार, 6 अगस्त 2016

अगस्त 06, 2016

इस मंदिर में हवा में लटकती मूर्ति देख महमूद गजनवी भी हो गया था आश्चर्यचकित,जानिये क्या था मूर्ति का रहस्य

somnath mandir
सोमनाथ का मंदिर अरब सागर के तट पर अवस्थित है. समुद्र की लहरे इस मंदिर को छू कर गुजरती थी. यहाँ स्थापित सोमनाथ की मूर्ति स्थापत्य कला की उत्कृष्ट मानी जाती रही है. यह मूर्ति मंदिर के मध्य बिना किसी सहारे के खड़ी थी. बिना आधार की इस मूर्ति को ऊपर से सहारा देने के लिये भी कुछ नहीं था. 

1025 में गजनवी ने किया था मंदिर पर हमला.
सन 1025 के दिसम्बर के मध्य गज़नी का तुर्क सरदार महमूद यहाँ आया था. उसके लिये भी मूर्ति का बिना किसी सहारे के खड़े होना अचरज की बात थी. उसने अपने सेवकों से इसका कारण पूछा जिसका उसे तुरंत संतोषजनक उत्तर नहीं मिला. यह मूर्ति किसी गुप्त वस्तु के सहारे खड़ी है ऐसा अधिकांश सेवकों का विश्वास था. यह जानकर उसने मूर्ति के चारों ओर भाला घुमाकर सेवकों से रहस्य का पता लगाने को कहा.

रहस्य जानने का प्रयास किया लेकिन नहीं जान पाया..
सभी सेवकों ने उसके आदेश का पालन किया. हालांकि, उन्हें ऐसी कोई वस्तु नहीं मिली जो भाले में अटके. महमूद मायूस हुआ. 


फिर यूँ पता चला मंदिर का रहस्य..

फिर उसे किसी सेवक ने बताया कि मंदिर का मंडप चुम्बक जड़ित है जबकि मूर्ति लोहे की बनी है. उसने इसे किसी कुशल कारीगर की कारीगरी करार दी जिसने यह व्यवस्था की थी. चुम्बक इस तरह व्यवस्थित रखी गयी कि किसी ओर अधिक दबाव न पड़े.

ruins of somnath

इस राय को सुनने के बाद महमूद ने मंडप की छत से कुछ पत्थर निकालने का आदेश दिया. आदेश के पालन के दौरान मूर्ति एक ओर झुक गयी. सारे पत्थर निकाल लेने पर मूर्ति जमीन पर गिर पड़ी. इस तरह सोमनाथ मंदिर में रखी गयी मूर्ति के पीछे की स्थापत्य कला की जानकारी आम लोगों को हुई.

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गुरुवार, 4 अगस्त 2016

अगस्त 04, 2016

ये हैं अमेरिका का सबसे बड़ा हिन्दू मंदिर,इस मंदिर की भव्यता देख अभिभूत हो जायेंगे आप,देंखे तस्वीरे

मंदिर के अंदर का भव्य दृश्य जिसे देख आप हो जाएंगे विस्मृत ।
न्यू जर्सी। ये हैं अमेरिका के न्यू जर्सी राज्य के रॉबिंसविले में स्तिथ स्वामीनारायण संप्रदाय ने मंदिर,  दावा है कि यह अमेरिका में अबतक का सबसे बड़ा मंदिर है। मंदिर के निर्माणकर्ता बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था के अनुसार यह मंदिर 162 एकड़ में फैली है। मंदिर की कलाकृति को प्राचीन भारतीय संस्कृति को ध्यान में रखकर बनया गया है।
मंदिर बनाने में करीब 108 करोड़ रुपए संस्था के अनुसार, यह मंदिर 134 फीट लंबा और 87 फीट चौड़ा है, जिसमें 108 खंभे और तीन गर्भगृह बनाए गए हैं। मंदिर को लेकर दावा किया जा रहा है कि यह मंदिर भारतीय वास्तुशास्त्र और शिल्पशास्त्र के मुताबिक बनी है।


इस मंदिर के निर्माण में करीब 108 करोड़ रुपए यानी 1.8 करोड़ यूएस डॉलर की लागत आई है। मंदिर को बनाने के लिए इटालियन करारा संगमरमर (मार्बल) का उपयोग हुआ है। इन पत्थरों पर नक्काशी का पूरा काम भारत में ही हुआ था, जिसे बाद में न्यूजर्सी पहुंचाया गया।


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रविवार, 31 जुलाई 2016

जुलाई 31, 2016

मंदिर अपने आप देता हैं बारिश होने से 7 दिन पहले संकेत, वैज्ञानिको की समझ से भी परे हैं इसका रहस्य

अपना देश भारत एकमात्र ऐसा देश हैं जहां पर हर वस्तु और हर जगह आश्चर्य और चमत्कार से भरी हुई है। इस देश के हर राज्य के हर शहर के कोने-कोने में कोई न कोई अदुभुत जगह मौजूद है। ऐसी ही एक जगह है भारत के राज्य उत्तर प्रदेश के कानपुर जनपद में स्थित भगवान जगन्नाथ का मंदिर जो की अपनी एक अनोखी विशेषता के कारण प्रसिद्ध है। इस मंदिर की विशेषता यह है की यह मंदिर बारिश होने की सुचना 7 दिन पहले ही दे देता है। तो आईये जानते हैं इसका रहस्य और विशेषता। 





 कानपुर का जगन्नाथ मंदिर

यह मंदिर भगवान जगन्नाथ का मंदिर है। यह मंदिर कानपुर जनपद के भीतरगांव विकासखंड मुख्यालय से तीन किलोमीटर पर बेंहटा गांव में स्थित है। ऐसा कहा जाता है कि इस मंदिर की खासियत यह है कि बरसात से 7 दिन पहले इसकी छत से बारिश की कुछ बूंदे अपने आप ही टपकने लगती हैं। हालांकि इस रहस्य को जानने के लिए कई बार प्रयास हो चुके हैं पर तमाम सर्वेक्षणों के बाद भी मंदिर के निर्माण तथा रहस्य का सही समय पुरातत्व वैज्ञानिक पता नहीं लगा सके। बस इतना ही पता लग पाया कि मंदिर का अंतिम जीर्णोद्धार 11वीं सदी में हुआ था।

 उसके पहले कब और कितने जीर्णोद्धार हुए या इसका निर्माण किसने कराया जैसी जानकारियां आज भी अबूझ पहेली बनी हुई हैं, लेकिन बारिश की जानकारी पहले से लग जाने से किसानों को जरूर सहायता मिलती है। इस मन्दिर में भगवान जगन्नाथ, बलदाऊ और बहन सुभद्रा की काले चिकने पत्थर की मूर्तियां स्थापित हैं। वहीं सूर्य और पदमनाभम भगवान की भी मूर्तियां हैं। मंदिर की दीवारें 14 फीट मोटी हैं। वर्तमान में मंदिर पुरातत्व विभाग के अधीन है। मंदिर से वैसी ही रथ यात्रा निकलती है जैसी पुरी उड़ीसा के जगन्नाथ मंदिर से निकलती है। मौसमी बारिश के समय मानसून आने के एक सप्ताह पूर्व ही मंदिर के गर्भ ग्रह के छत में लगे मानसूनी पत्थर से उसी घनत्वाकार की बूंदें टपकने लगती हैं, जिस तरह की बरसात होने वाली होती है। जैसे ही बारिश शुरू होती है वैसे ही पत्थर सूख जाता है। मंदिर के पुजारी दिनेश शुक्ल ने बताया कि कई बार पुरातत्व विभाग और आईआईटी के वैज्ञानिक आए और जांच की। न तो मंदिर के वास्तविक निर्माण का समय जान पाए और न ही बारिश से पहले पानी टपकने की पहेली सुलझा पाए हैं। 

हालांकि मंदिर का आकार बौद्ध मठ जैसा है। जिसके कारण कुछ लोगों की मान्यता है कि इसको सम्राट अशोक ने बनवाया होगा, परन्तु मंदिर के बाहर बने मोर और चक्र की आकृति से कुछ लोग इसको सम्राट हर्षबर्धन से जोड़ कर देखते हैं।
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गुरुवार, 21 जुलाई 2016

जुलाई 21, 2016

भारतीय सेना की टैंक यूनिट पर लग रहा हैं हिन्दुओ के अपमान का आरोप



भारतीय सेना की टैंक यूनिट पर हिन्दुओ के अपमान का आरोप लग रहा हैं,दरअसल भारतीय सेना ने पूर्वी लद्दाख में हाल ही में टैंको की तैनाती की थी (पूरी खबर यहाँ पढ़े :- चीन के खिलाफ भारत ने उठाया एक और बड़ा कदम, चीन में मचा हडकंप  )

खबर तो काफी अच्छी थी लेकिन उसमें ख़ास बात ये थी की उन टैंक्स के नाम थे महाराणा प्रताप,औरंगजेब और टीपू सुल्तान, 
औरंगजेब और टीपू सुलतान जेसे हिन्दुओ विरोधियों के नाम पर टैंक रेजीमेंट  का नाम रखा जाना विवाद का कारण बन रहा हैं,

टीपू सुल्तान के बारे में समर्थको द्वारा ये तर्क दिया जाता रहा हैं की टीपू सुलतान ने अंग्रेजो से जंग की थी इसलिए उनके हिन्दू विरोधी अभियानों को भुलाकर उन्हें देश भक्त माना जाना चाहिए चलिए एक बार के लिए एक तर्क मान भी लिया जाए लेकिन फिर औरंगजेब जेसे क्रूर शासक के नाम पर टैंक रेजिमेंट का नामकरण किया जाना कतई हजम नहीं होता हैं औरंगजेब ने केवल हिन्दुओ पर ही नहीं बल्कि सभी गैर मुस्लिमो पर जजिया कर थोपा था,इस्लाम ना कबूल करने पर बहुतो को मौत दी थी,थोड़े दिनों पहले दिल्ली की औरंगजेब रोड का नाम भी बदलकर गुरु तेज बहादुर रोड कर दिया गया था, ऐसे में इस तरह से सांप्रदायिक और क्रूर व्यक्ति के नाम पर टैंक रेजिमेंट का नामकरण किया जाना विवाद का कारन बन रहा हैं. 

कांग्रेस के राज में टीपू सुल्तान और औरंगजेब जैसो को सम्मान मिलना आम बात थी लेकिन बीजेपी राज में इस तरह के क्रत्यो को देखकर लोगो में काफी नाराजगी हैं,सोशल मीडिया पर भारतीय सेना के इस निर्णय का काफ़ी विरोध भी देखने को मिल रहा हैं.